दिल्ली : भारत एक कृषि प्रधान देश है। यहाँ की लगभग 60 से 65 प्रतिशत आबादी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर है। भारतीय किसान न केवल राष्ट्र की खाद्य सुरक्षा का प्रहरी है, बल्कि अर्थव्यवस्था की गति का भी प्रमुख आधार है। लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह है कि देश का यह अन्नदाता आज नकली और घटिया खाद, बीज और कीटनाशकों के कारण बर्बादी के कगार पर है। यह समस्या अब छिटपुट नहीं रही, बल्कि एक संगठित और गहरी साज़िश बन गई है जिसमें कई स्तरों पर भ्रष्टाचार और प्रशासनिक उदासीनता साफ़ दिखाई देती है। केंद्र सरकार के “विकसित कृषि संकल्प अभियान” के पीछे का सच यह है कि किसान को नकली उत्पाद बेचे जा रहे हैं।

देश के कई राज्यों में नकली खाद-बीज का दुष्चक्र खुलेआम चल रहा है। नकली खाद, बीज और कीटनाशकों का जाल कई छोटे-बड़े शहरों और गाँवों में फैल चुका है। किसान जब स्थानीय दुकानों से उत्पाद खरीदते हैं, तो उन पर ‘सरकारी सब्सिडी’ और ‘सरकारी ब्रांडिंग’ का लेबल और देश के प्रधानमंत्री की तस्वीर लगी होती है, जिससे उन्हें यह भ्रम होता है कि यह असली सामान है। लेकिन बुआई के कुछ हफ़्ते बाद, जब फ़सल सूखने लगती है या कीड़ों द्वारा नष्ट हो जाती है, तब उन्हें असलियत का पता चलता है। ऐसे कई मामले हैं जहाँ किसानों ने बैंकों और साहूकारों से कर्ज़ लेकर खेती शुरू की, लेकिन घटिया उत्पाद मिलने के कारण फ़सल बर्बाद हो गई और किसान कर्ज़ में डूब गया। इससे साफ़ ज़ाहिर होता है कि प्रशासनिक मिलीभगत है और क़ानून का पालन ठीक से नहीं हो रहा है।
सरकार को समाधान और उसके उपाय ढूँढ़ने चाहिए, किसानों से नीतिगत और व्यावहारिक सुझाव लेने चाहिए। नकली बीज और खाद बेचने वालों के ख़िलाफ़ आईपीसी की धारा 420 के तहत कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए, जिसमें सज़ा और लाइसेंस रद्द करना शामिल है। किसानों को तुरंत मुआवज़ा दिया जाना चाहिए, सरकार ऐसे मामलों में त्वरित जाँच करवाकर किसानों को आर्थिक मुआवज़ा दे। ताकि उन्हें बर्बाद होने से बचाया जा सके। उत्पाद बेचने वालों को प्रामाणिकता की गारंटी देनी होगी। सरकार को कृषि उत्पादों की गुणवत्ता की जाँच के लिए एक स्वतंत्र और पारदर्शी व्यवस्था स्थापित करनी चाहिए।
हालाँकि, हर साल सत्ताधारी दल के नेताओं के चुनावी नारे और ज़मीनी हकीकत अलग-अलग नज़र आती है। दरअसल, हर चुनाव से पहले राजनीतिक दल किसानों से बड़े-बड़े वादे करते हैं जैसे कर्जमाफी, फसल बीमा, एमएसपी, आधुनिक कृषि उपकरण आदि। लेकिन चुनाव जीतने के बाद नेताओं के इन वादों का सारा जोश ‘विकास’ के दूसरे अर्थों में सिमट जाता है। आज किसान की पीड़ा पर न तो संसद में गंभीर बहस होती है और न ही उसे मीडिया में वो जगह मिलती है जो किसी पूंजीपति, व्यापारी या फिल्म स्टार की खबर को मिलती है। मेरा कहना है कि आज किसान सिर्फ़ वोट बैंक नहीं, बल्कि देश का निर्माता है।

